" अलगाववाद की जड़ है धारा - 370 "

संविधान के विशेष अनुच्छेद धारा -370 प्रावधान जम्मू-कश्मीर को संपूर्ण भारत से अलग विशेष दर्जा प्रदान करता है।

यह धारा अलगाववाद के लिए जिम्मेदार है।इसके तहत दोहरी नागरिकता, अलग राष्ट्रध्वज, उच्चतम न्यायालय के आदेश अमान्य होने के साथ RTI और CAG के कानून भी लागू नहीं हैं।भारत के राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।

भारत के राजनीतिक दलों को यह समझने की आवश्यकता है कि कश्मीर को सही रास्ते में लाए बगैर पाकिस्तान को उसके किए की सजा देना कठिन है।

इस आघाती प्रावधान धारा- 370 का डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कड़ा विरोध किया था।1952 में उन्होनें कहा था कि " आप जो करने जा रहे हैं वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा।यह प्रावधान उन लोगों को मजबूत करेगा जो कहते हैं कि भारत एक देश नहीं बल्कि कई राष्ट्रों का समूह है। "

डाॅ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी की आशंका गलत नहीं थी।धारा -370 के कारण ही कश्मीर मुख्य धारा से जुड़ने की वजाय अलगाववाद के रास्ते में चल पड़ा।

एक लेख के मुताबिक डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने भी इस प्रावधान का विरोध किया था। उन्होने शेख अब्दुल्ला को कहा था कि " आप चाहते हैं भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे,आपके लिए सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्जा हो जो भारत का है।लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी देना देश के हितों से दगाबाजी करने जैसा है और मैं कानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।

परन्तु जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से यह प्रावधान तैयार हुआ था।नेहरू की अदूरदर्शिता का नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है।आज कश्मीर भारत के अंदर एक छोटा पाकिस्तान बनता जा रहा है।

भारत सरकार को चाहिए कि किसी भी हद तक जाकर कश्मीर से धारा -370 को समाप्त करें।

"जुगनुओं की फौज पहुँची सूर्य से लडने...
बो दिये बिष दंश अब तो चींटियों तक ने...
तो कब तलक आतंक को ही सच कहेंगे हम...?

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