"राजनीति के चरित्र में एक ही ख़ूबी है उसका कोई चरित्र नहीं होता"
हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार,मध्यप्रदेश के उज्जैन में जन्मे श्री शरद जोशी जी के जन्मदिवस पर उन्हें #श्रद्धांजलि.....
😡😡तब आप क्या कर रहे थे..?? #द कश्मीर फाईल्स* की जबरदस्त सफलता के कारण तमाम वामपंथी और इस्लामिस्ट्स बौखला गए हैं. आज तक खड़ा किया सारा विमर्श उन्हे बिखरता हुआ नजर आ रहा हैं. इसलिए राष्ट्रवाद के इस नए तूफान को भ्रमित करने, वे सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर यह प्रश्न उठा रहे हैं, “तब आप क्या कर रहे थे..? दिल्ली में सरकार आपकी थी. राज्यपाल जगमोहन आपके थे. फिर भी यह नरसंहार क्यूँ हुआ.? क्या किया आपने तब ?? ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ इस मुहावरे का इससे अच्छा प्रयोग नहीं हो सकता. 1984 में आठवी लोकसभा के चुनाव में काँग्रेस को राक्षसी बहुमत मिला था. कुल 514 में से 404 सीट्स. भाजपा के मात्र 2 सांसद चुन कर आए थे. किन्तु परिस्थिति तेजी से बदली. 1989 के चुनाव मे, उन्ही राजीव गांधी के नेतृत्व में काँग्रेस बहुमत का आंकड़ा भी नहीं छूं सकी. उन्हे मिली 197 सीटें. नवगठित ‘जनता दल’ के 143 सदस्य चुनकर आए. रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण पहली बार, भाजपा का आंकड़ा 2 से बढ़कर 85 तक पहुंचा था. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 33 सीटें मिली थी. अतः जनता दल की सरकार बनी, जिसे भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टी ने बाह...
मानव जीवन में किसी बडे मुकाम पर पहुंचकर एक साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार करने वाले विरले ही होते हैं।डाॅ.नरोत्तम मिश्र उन्ही विरले महापुरुषों में से एक हैं।उनका सरल,सहज,संवेदनाओं से परिपूर्ण स्वभाव आकर्षण का केंद्र है।किसी अजनबी से भी मिलकर, कुछ पल में ही अपना बना लेने की उनकी कला अनुकरणीय है।यही कारण है,कि उनके असंख्य समर्थक हैं। ग्वालियर में जन्मे डाॅ.नरोत्तम मिश्र एम ए,पीएचडी हैं, उन्होने राजनीति का आरंभ छात्रसंघ से किया।वो सन् 1977-78 में जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर छात्रसंघ के सचिव रहे,1978-80 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य,1985-87 में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य रहने के बाद 1990 में ग्वालियर जिले की डबरा विधानसभा से विधायक बने।1998 में दूसरी बार,2003 में तीसरी बार निर्वाचित हुए।1जून 2005 में बाबूलाल गौर जी के साथ प्रदेश के राज्यमंत्री बने।4 दिसंबर 2005 में शिवराज सिंह चौहान जी की कैबिनेट में पुनः स्थान मिला।2008 में चौथी बार दतिया विधानसभा से विधायक निर्वाचित होने के बाद 28 अक्टूबर 2009 में तथा पांचवी बार निर्वाचित होने के बाद ...
बीते रविवार को अमेरिका में बसे इंजीनियर ऋतुराज साहनी लंबे अरसे बाद अपने घर मुंबई लौटे तो घर पर उनका सामना अपनी माँ के कंकाल से हुआ। बेटे को नहीं मालूम कि उसकी माँ आशा साहनी की मौत कब और किन परिस्थितियों में हुई। आशा साहनी के बुढ़ापे की आशा उनके इकलौते बेटे ने खुद स्वीकार किया कि उसकी मां से आखिरी बातचीत कोई सवा साल पहले हुई थी। 23 अप्रैल, 2016 को माँ ने कहा था कि बेटा अब अकेले नहीं रह पाती हूं। या तो अपने पास अमेरिका बुला लो या फिर मुझे किसी ओल्डएज होम में भेज दो। बेटे ने ढाढ़स दिया कि वह जल्द ही इंडिया आएगा। वह सवा साल बाद माँ से किया वादा पूरा करने इंडिया आया, पर मां के हिसाब से देर हो गई। इसी बीच न जाने कब आशा साहनी की मौत हो गई। रविवार को ऋतुराज किसी तरह घर के भीतर घुसे तो उन्हें अपनी 63 साल की मां आशा साहनी का कंकाल मिला। आशा साहनी 10वें फ्लोर पर अकेले रहती थीं। उनके पति की मौत 2013 में हो चुकी थी। पुलिस के मुताबिक 10वीं मंजिल पर स्थित दोनों फ्लैट साहनी परिवार के ही हैं। बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 में बात होने की जानकारी ऐसे दी मानो वह अपनी माँ से कितना रेगुलर टच में था। जैस...
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