" श्रमिक हमारे निर्माता "- पद्मेश गौतम (मजदूर दिवस पर विशेष)

श्रमिकों की हमारे देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है।श्रमिक के बिना किसी भी निर्माण की कल्पना अधूरी है,चाहे वह औद्योगिक ढांचा हो अथवा किसी अन्य तरह का निर्माण।
आज इस कंप्यूटर युग में मशीनो का उपयोग तो अत्यधिक हो गया,लेकिन श्रमिकों से भरे रहने वाले औद्योगिक इकाइयां, कारखानों में मजदूरों की कमी होने से एक ओर हमारे मजदूर बेरोजगारी की तरफ चले गए तो दूसरी ओर इन कारखानों,इकाइयों की सुंदरता चली गई। मजदूर आज भी मजदूर ही है।उसकी तरक्की के लिए सरकार ने योजनायें संचालित की,लेकिन कोई खास बदलाव नहीं हो पाया है।मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है। हम मजदूर दिवस या मई दिवस मनाते हैं,पर इसके पीछे मजदूरों के बलिदान को भूल जाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मई दिवस या मजदूर दिवस का आरंभ अमेरिका से हुआ था।अनेकों वर्षों तक शोषित श्रमिक वर्ग जोकि मालिकों के अधीन एक गुलाम की तरह काम करता था।जिसके काम करने का न तो कोई समय निर्धारित था और न ही मजदूरी।
लगभग 1850 के बाद अमेरिका में श्रमिक एकजुट होने का प्रयास करने लगे।अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन बना,जिसने 1866 में अपने अधिवेशन में यह मांग रखी थी कि उद्योग,मिल,कारखानों में मजदूर से एक दिन में 8 घंटे ही काम कराया जाए।उस समय श्रमिकों ने शोषण के विरूद्ध आवाज उठाई,कई श्रमिक मारे गए। इसके बाद शिकागो में मजदूरों के साथ शहर के नागरिकों ने भी एक जुलूस निकाला,उस जुलूस में किसी असामाजिक तत्व ने एक देशी बम फेंक दिया था।जिसमें जुलूस के पीछे चल रहे एक पुलिस कर्मी की मौत हो गई और कुछ घायल भी हुए। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई और आंदोलनरत श्रमिक नेताओं को सरेआम फांसी पर लटका दिया गया। इस निर्मम दमन के बाद भी श्रमिक अपने शोषण के विरूद्ध लड़ते रहे।
1 मई 1890 को इन बलिदानियों की स्मृति में संपूर्ण विश्व में स्मरण दिवस मनाने का आव्हान किया गया,और बाद में यह मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
ऐसा नहीं था कि श्रमिकों का शोषण केवल एक देश में हो रहा था।पूरे विश्व में श्रमिक एक गुलाम की भांति काम कर रहे थे।उनसे 18 घंटे काम कराया जाता था।मालिक अपने हिसाब से मजदूरी देते थे।मजदूर काम करते -करते असमय मौत का शिकार हो जाते थे।उनके लिए नियम कानून लागू नहीं थे।
भारत में भी अनेक श्रमिक यूनियन बने लेकिन ये सभी यूनियन राजनैतिक दलों द्वारा बनाए जाने के कारण मजदूरों के नाम पर मालिकों से रूपये ऐंठने का काम करने लगे और मजदूर केवल यूनियन के नेताओं की स्वार्थ सिद्धि का मोहरा बनकर रह गए।
भारतीय मजदूर वर्ग के लिए वरदान सिद्ध हुए एक संगठन निर्माण 23 जुलाई 1955 में हुआ।इस संगठन का निर्माण भोपाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने श्रमिकों का शोषण रोकने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए ' भारतीय मजदूर संघ ' की स्थापना की।भारतीय मजदूर संघ भारत का सबसे बडा गैर राजनैतिक केन्द्रीय श्रमिक संगठन है।स्वतंत्रता संग्राम के प्रख्यात सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी के जन्मदिवस के दिन यह संगठन बना था।भारतीय मजदूर संघ का निर्माण अन्य संगठनों की तरह किसी संगठन के विभाजन के कारण नहीं हुआ बल्कि एक विचारधारा के लोगों का सम्मिलित अभियान का परिणाम था।भारतीय मजदूर संघ ने ऐतिहासिक संघर्ष के बाद भारतीय मजदूरों को एक सम्मान जनक स्थान दिलाया।मजदूरों के शोषण के समाप्त करने के लिए अनेक क्रांतिकारी आंदोलन हुए।
वर्तमान में शासन की ओर से मजदूरों के लिए अनेक सख्त कानून बनाए गए हैं,परन्तु जब तक उद्योगपतियों,मिल-कारखाने के मालिकों,ठेकेदारों की मानसिक स्थिति में बदलाव नहीं होगा तब तक मजदूर वर्ग का हित प्रभावित होता रहेगा।
क्या कारण है, कि ताजमहल से ताज होटल तक हो,या संसद भवन से राष्ट्रपति भवन का निर्माता ! आज भी प्रातः उठकर सबसे पहले अपने परिवार के भरण पोषण की चिंता में डूब जाता है...?
हम सुख पाने के लिए आज भी ऐसे मानव का समूह चाहते हैं,जो उतने सुख में न रहे,जितने में हम रहते हैं।जब यह संसार नश्वर है,प्रत्येक व्यक्ति का जीवन नश्वर है।और हमारे वेद-शास्त्र बताते हैं,कि मानव जीवन बडी मुश्किल से मिलता है,तो हम क्यों नहीं चाहते कि प्रत्येक मनुष्य को इस बात का सुख और आनंद मिले कि उसने मानव जीवन पाया है।सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलते।
                             पद्मेश गौतम
                                   कटनी

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