बेरोजगारी राष्ट्रनिर्माण में बाधक - पद्मेश गौतम
आज बेरोजगारी देश की प्रमुख समस्या बनती जा रही है। इसका प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि, पूँजी की कमी,अनुपयुक्त शिक्षा प्रणाली आदि है । यह समस्या आधुनिक समय में युवावर्ग के लिये घोर निराशा का कारण बनी हुई है।चाहे वह मध्यमवर्गीय परिवार हो या गरीब,ग्रामीण हों या शहरी, सभी वर्ग के युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।हमारी सरकार बेरोजगारी की समस्या से निजात दिलाने शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में लगातार नवीनतम प्रयास कर रही है,परन्तु इससे उबरना इतना आसान नहीं है।जब तक जनसंख्या नियंत्रण और आर्थिक विकास में क्रांतिकारी बदलाव नहीं होंगे,तब तक बेरोजगारी पनपती रहेगी।जनसंख्या नियंत्रण सभी के लिए सख्ती से लागू होना चाहिए।क्योंकि अब कोई भी वर्ग अल्पसंख्यक नहीं रहा।
ऐसा नहीं है,कि बेरोजगारी की समस्या समाप्त नहीं हो सकती। क्योंकि यह समस्या हमारे द्वारा ही उत्पन्न की गई है,और इसे समाप्त भी हमें ही करना होगा। इसके लिए आवश्यक है,कि रोजगार दिलाने वाली शासकीय योजनाओं को व्यवस्थित तरीके से सरलीकरण करके ठीक से लागू किया जाये। तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा को शिक्षा का आधार बनाया जाए। आवश्यकता इस बात की भी है कि इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिये हम सभी सरकार का सहयोग दें।
बेरोजगारी का आशय उस अवस्था से है,जब कोई योग्य व्यक्ति कार्य करने के लिए तैयार होता है,उसे उसकी योग्यतानुशार काम नहीं मिलता है।कई बार इच्छाशक्ति की कमी भी युवाओं को मानसिक अक्षम बनाती है,और कई बार तो पूंजी की कमी भी स्वरोजगार में बाधक होती है।
ग्रामीण क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि होने से कृषकों की संख्या बढ़ गई है।जिसके कारण कृषि भूमि में कमी आ गई,और बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी हुई। पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ,गांव को शहर से जोडा गया।सडक,पानी,बिजली लगभग भारत के सभी गांव तक पहुंचने के बाद भी ग्रामीण युवाओं को अपेक्षाकृत रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाया है।इसके लिए संगठित ढंग से काम करना अतिआवश्यक है।हम देखते हैं,कि ऐसे अनेक युवा बेरोजगारी से परेशान हैं,जो शिक्षित तो हैं,परन्तु तकनीकी शिक्षा प्राप्त न होने से उन्हें रोजगार नहीं मिल रहा है।अशिक्षित युवा मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करते हैं,उन्हें अल्पकालीन रोजगार मिलता है,जोकि उनकी निरंतर आय का श्रोत नहीं बन पाता है।अधिकतर निजी औद्योगिक इकाईयां निर्धारित मौसम में ही चालू रहती हैं।इस प्रकार श्रमिकों को भी पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिलता है।ऐसी ही समस्या शहरी इलाकों में भी है।
अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है,कि जब सरकार द्वारा गंभीरता से रोजगार मूलक अनेक प्रभावी योजनायें संचालित हैं,तब भी बेरोजगारी में कमी क्यों नही आ रही है...? इसका एक कारण भारतीय बैंकिंग व्यवस्था भी है।क्योंकि शासकीय योजनाओं में बैंकों द्वारा पर्याप्त सहयोग नहीं किया जा रहा है।जिससे शासकीय योजनाओं के संचालन का लाभ बेरोजगार युवकों को नहीं मिलता है।
कोई भी सरकार कितना भी भारत निर्माण की बात करे,लेकिन जब तक हमारे देश का युवा बेरोजगारी के चंगुल में जकड़ा रहेगा तब तक हम विकसित राष्ट्र का सपना साकार नहीं होगा।
(पद्मेश गौतम)
कटनी
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